शिक्षा के अधिकार हेतु वित्तीय स्रोतो की व्यवस्था का विवेचन कीजिए ।

शिक्षा के अधिकार हेतु वित्तीय स्रोतो की व्यवस्था का विवेचन कीजिए ।

18.3.5 वित्तीय स्रोत

मूलतः राज्य, समाज व समुदाय के सहयोग से इस शिक्षा अधिनियम को क्रियान्वित करेंगे व गुणवत्तायुक्त शिक्षा के अवसर प्रत्येक बालक के लिये उपलब्ध करायेंगे । विश्व के कुछ ही देशों में निःशुल्क व बाल केन्द्रित शिक्षा व बालक अनुकूल शिक्षा का प्रावधान है । केन्द्र व राज्य सरकारें मिलकर इस अधिनियम हेतु वित्तीय भार उठायेगी । केन्द्र सरकार ने वित्त आयोग की मदद से राज्य सरकारों को इस अधिनियम के क्रियान्वयन हेतु अतिरिक्त वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने का अनुरोध किया है । केन्द्र सरकार द्वारा दी जाने वाली वित्तीय सहायता के अतिरिक्त राज्य सरकारें अन्य आवश्यक व बचे हुए खर्चा हेतु आवश्यक राशि जुटाने या उपलब्ध कराने हेतु उत्तरदायी होगी । केन्द्र व राज्य सरकारों द्वारा वहन किये जा रहे खर्चा के अतिरिक्त खर्चा को समाज, विकास निकाय, व्यापारिक संगठन व नागरिक मिलकर वहन करेंगे ।

शिक्षा के अधिकार अधिनियम 2009 को लागू करने के लिये केन्द्र व राज्य सरकारें 65%- 35% के अनुपात से वित्तीय भार वहन करेंगी और उत्तरपूर्वी राज्यों के लिए यह अनुपात 90%से 10% निर्धारित किया गया है ।

18.3.6 विद्यालय हेतु मानदण्ड एवं मानक

1. अध्यापकों की व्यवस्था!
– कक्षा प्रथम से पाँचवी तक
– कक्षा 6 से 8 तक
2. भवन व्यवस्था
– प्रत्येक अध्यापक हेतु पृथक कक्षा कक्ष ।
– कम से कम एक कार्यालय
– प्रधानाचार्य कक्ष
– लड़के व लड़कियों के लिये पृथक शौचालय विद्यार्थियों की संख्या |
अध्यापकों की संख्या
प्रधानाध्यापक – सभी विद्यार्थियों हेतु स्वच्छ, सुरक्षित व पर्याप्त पीने का पानी
– मिड-डे-मील बनाने हेतु प्रति विद्यालय एक रसोई कक्ष |
35 विद्यार्थी संख्या
→ 1. सामाजिक अध्ययन प्रति कक्षा हेतु 3|
→ 2. विज्ञान व गणित | अध्यापक
→ 3. भाषा 100 से अधिक

प्रधानाचार्य
→ 1. कला शिक्षा अंशकालीन अनुदेशक →
2. स्वास्थ्य व शारीरिक शिक्षा

3. कार्य योजना शिक्षा – खेल का मैदान – विद्यालय भवन की सुरक्षा हेतु चहार दीवारी ।
3. कार्यदिवस व एक शैक्षणिक सत्र हेतु अनुदेशन के कालांश
– कक्षा प्रथम से कक्षा पांच तक 200 कार्य दिवस
– कक्षा 6 से कक्षा 8 तक 220 कार्य दिवस ।
– कक्षा प्रथम से कक्षा पांच तक 800 अनुदेशन हेतु घण्टे ।
कक्षा 6 से कक्षा 8 तक 1000 घंटे |

4. पाठ्यक्रम एवं प्राथमिक शिक्षा की पूर्णता –

प्राथमिक शिक्षा के पाठ्यक्रम व मूल्यांकन हेतु प्रक्रिया राज्य सरकार द्वारा निर्धारित की जायेगी । पाठ्यक्रम, बालक के सर्वांगीण विकास, बालक में ज्ञान, प्रतिभा, ……………. का निर्माण, शारीरिक व मानसिक क्षमताओं का विकास, क्रिया द्वारा शिक्षण, ज्ञान की खोज, बालक-अनुकूल (Child Friendly) व बालक केन्द्रित होना चाहिये । | अनुदेशन का माध्यम बालक की मातृभाषा होनी चाहिये ।। पाठ्यक्रम ऐसा होना चाहिए जो बालक को भय, संकट व भग्नाशा से दूर करे व बालक में विचारों को स्वतंत्र रूप से व्यक्त करने की क्षमता विकसित कर सके । बालक के ज्ञान, अवबोध व ज्ञान के उपयोग का व्यापक व निरन्तर मूल्यांकन किया जाना चाहिये । – किसी भी बालक को प्रारंभिक शिक्षा पूर्ण करने तक किसी बोर्ड की परीक्षा उत्तीर्ण करने की आवश्यकता नहीं होगी ।
– प्रत्येक विद्यार्थी को प्रारंभिक शिक्षा पूर्ण हो जाने पर एक प्रमाण पत्र प्रदान किया जायेगा ।
5. शिक्षण:- अधिगम उपकरण प्रत्येक कक्षा में आवश्यकतानुसार उपलब्ध कराये जाने चाहिये ।।
6. पुस्तकालय- प्रत्येक में एक पुस्तकालय होना चाहिये । इस पुस्तकालय में सभी विषयों की पुस्तकें, समाचार पत्र, पत्रिकाओं के साध्य कहानियों की किताबें भी उपलब्ध करायी जानी चाहिये।।
7. खेल का सामान व उपकरण प्रत्येक विद्यालय में प्रत्येक कक्षा की आवश्यकतानुसार उपलब्ध कराया जाना चाहिये ।।

विद्यालयों के उत्तरदायित्व

1. से 14 वर्ष के बालक प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने के लिये किसी भी पड़ौस के विद्यालय में प्रवेश ले सकते है !
2. किसी भी बालक को प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने हेतु किसी भी विद्यालय द्वारा किसी भी प्रकार की राशि नहीं ली जायेगी । यह शिक्षा पूर्णतया निःशुल्क होगी ।
3. यदि 6 वर्ष की आयु से अधिक हो जाने पर भी बालक ने किसी विद्यालय में प्रवेश नहीं लिया है तो उसे किसी भी विद्यालय में उसकी आयु के अनुसार कक्षा में प्रवेश का अधिकार होगा व विद्यालय द्वारा उसकी आयु के अनुसार क्षा में प्रवेश देना होगा ।
4. इस अधिनियम के अन्तर्गत प्रवेश प्राप्त विद्यार्थियों को 14 वर्ष से अधिक आयु का हो जाने के पश्चात भी प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार होगा ।
5. जिन विद्यालयों में प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने की सुविधा उपलब्ध नहीं है। विद्यार्थियों को उस विद्यालय से अन्य किसी विद्यालय में स्थानान्तरित होने का अधिकार होगा ।
6. यदि कोई विद्यार्थी किसी भी कारण से अपने राज्य के भीतर या अन्य राज्य में किसी भी अन्य विद्यालय में स्थानान्तरण चाहता है तो उसे इसका अधिकार होगा। 7. इस तरह के स्थानान्तरण के लिये प्रधानाचार्य या प्रभारी को तुरन्त प्रमाण पत्र बालक को देना होगा ।
8. यदि प्रधानाचार्य या प्रभारी दवारा इस प्रकार का प्रमाण पत्र जारी करने में किसी भी कारण से किसी भी प्रकार की देरी की जाती है तो उसके विरूद्ध सेवा नियमों के तहत अनुशासनात्मक कार्यवाही की जायेगी ।

18.3.8 शिक्षा के अधिकार अधिनियम के संरक्षण प्रावधान

बाल अधिकार संरक्षण अधिनियम 2005 के अन्तर्गत गठित राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (भाग-3) एवम राज्य बाल संरक्षण अधिकार आयोग शिक्षा के अधिकार के संरक्षण के लिए कार्य करेंगे ।
1. ये दोनों आयोग अपने-अपने क्षेत्रों में शिक्षा का अधिकार अधिनियम की क्रियान्विति का | परीक्षण एवं पुनरावलोकन करेंगे ।
2. बालकों के लिए निःशुल्क व अनिवार्य शिक्षा के अधिकार के विरूद्ध शिकायतों की जांच करेगे।
3. जिन राज्यों में राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग गठित नहीं हुए हैं वहां राज्य सरकारें या उपयुक्त सरकारें इस अधिनियम की क्रियान्विति करवायेगी ।
4. केन्द्र सरकार 15 सदस्यों की एक राष्ट्रीय परामर्श परिषद गठित करेगी इस परिषद का कार्य केन्द्र सरकार को इस अधिनियम के प्रभावशाली क्रियान्वयन के हेतु सुझाव देना है।
5. राज्य सरकारें भी इसी प्रकार राज्य परामर्श परिषदों का गठन करेंगी । ये परिषदें राज्यों के संदर्भ में सुझाव देंगी ।

18.3.9 शिक्षा के अधिकार अधिनियम की बाधाएँ

1. गैर अनुदानित एवम् निजी विद्यालयों की समिति ने इस अधिनियम के विरूद्ध सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की है जिसमें कहा गया है कि यह अधिनियम उनके संवैधानिक अधिकारों (निजी प्रबन्ध राजकीय हस्तक्षेप के बिना शैक्षणिक संस्थाएँ चला सकती हैं) का हनन करता है ।

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