राष्ट्रीय ज्ञान आयोग एवं शिक्षा का अधिकार अधिनियम (National knowledge Commission And Right to Education Act)

राष्ट्रीय ज्ञान आयोग एवं शिक्षा का अधिकार अधिनियम (National knowledge Commission And Right to Education Act)

इकाई की रूपरेखा

18.0 उद्देश्य
18.1 प्रस्तावना
18.2 राष्ट्रीय ज्ञान आयोग की परिकल्पना
18.2.1 राष्ट्रीय ज्ञान आयोग के उद्देश्य
18.2.2 राष्ट्रीय ज्ञान आयोग का गठन
18.2.3 राष्ट्रीय ज्ञान आयोग की प्रमुख सिफारिशें
18.2.4 राष्ट्रीय ज्ञान आयोग की सिफारिशों पर अनुवर्ती कार्यवाही
18.2.5 राष्ट्रीय ज्ञान आयोग: राज्य स्तरीय पहले
18.3 शिक्षा का अधिकार अधिनियम
18.3.1 शिक्षा का अधिकार का अर्थ
18.3.2 अधिनियम बनने व लागू होने की प्रक्रिया
18.3.3 शिक्षा का अधिकार अधिनियम की मुख्य विशेषताएँ
18.3.4 सरकार के उत्तर दायित्व
18.3.5 वित्तीय स्रोत ।
18.3.6 विद्यालयों हेतु मानदण्ड एवं मानक
18.3.7 विद्यालयों के उत्तरदायित्व
18.3.8 शिक्षा के अधिकार अधिनियम के संरक्षण प्रावधान
18.3.9 शिक्षा के अधिकार अधिनियम की बाधाएँ
18.3.10 सफल क्रियान्वयन हेतु प्रयास
सारांश
18.5 शब्दावली
18.6 मूल्यांकन प्रश्न
18.7 संदर्भ ग्रंथ

18.0 उद्देश्य

इस इकाई को पढ़ने के बाद आप –
• राष्ट्रीय ज्ञान आयोग की परिकल्पना को समझ सकेंगे ।
• राष्ट्रीय ज्ञान आयोग की स्थापना के उद्देश्यों का विवेचन कर सकेंगे ।
• राष्ट्रीय ज्ञान आयोग की आवश्यकता को समझ सकेगें ।।
राष्ट्रीय ज्ञान आयोग की संरचना, प्रविधियों व कार्यों का विवेचन कर सकेंगे ।
राष्ट्रीय ज्ञान आयोग के क्षेत्र पंचभुज” को समझ सकेंगे।

राष्ट्रीय ज्ञान आयोग के विषय तथा उनके महत्व का निर्धारण कर सकेंगे

राष्ट्रीय ज्ञान आयोग की रिपोर्ट के प्रमुख तथ्यों की तथ्यात्मक जानकारी प्राप्त कर सकेंगे ।
राष्ट्रीय ज्ञान आयोग की प्रमुख सिफारिशों का तुलनात्मक अध्ययन कर सकेंगे ।
• राष्ट्रीय ज्ञान आयोग की सिफारिशों की क्रियान्विति के बारे में अनुमान लगा सकेंगे ।
• राष्ट्रीय ज्ञान आयोग के प्रभावों का विश्लेषण कर सकेंगे ।
| राष्ट्रीय ज्ञान आयोग की जानकारियों के आधार पर छात्रों का मार्ग निर्देशित कर सकेंगे।
• शिक्षा के अधिकार की आवश्यकता एवं महत्व को समझ सकेंगे ।
शिक्षा के अधिकार से सम्बन्धित वैधानिक प्रावधानों का उल्लेख कर सकेंगे ।
शिक्षा के अधिकार की वर्तमान स्थिति का विश्लेषण कर सकेंगे ।
शिक्षा के अधिकार के भावी प्रभावों का अनुमान लगा सकेंगे ।
शिक्षा को अधिकार की क्रियान्विति में केन्द्र व राज्य सरकार की भूमिका का विवेचन की सकेंगे ।
• शिक्षा के अधिकार से होने वाले सामाजिक, आर्थिक परिवर्तनों की व्याख्या कर सकेंगे ।
• शिक्षा को अधिकार हेतु जागरूकता के विकास में सकारात्मक योगदान दे सकेंगे ।
• शिक्षा के अधिकार हेतु विभिन्न विचारधाराओं का विश्लेषण कर सकेंगे ।
• शिक्षा के अधिकार के विभिन्न आयामों की विशेषताओं का शिक्षा में महत्व बता सकेंगे।

18.1 प्रस्तावना

21वीं सदी अपने साथ अनेक चुनौतियाँ लेकर आई । तीव्रता से हो रहे भौतिक, तकनीकी, वैज्ञानिक विकास, सामाजिक – आर्थिक परिवर्तन एक नवीन परिदृश्य उत्पन्न कर रहे हैं । विश्व के सभी राष्ट्र इन चुनौतियों का सामना अपनी परिस्थिति, संसाधन, शक्ति एवं सामर्थ्य के अनुसार कर रहे हैं । संसाधनों पर निर्भरता सदैव से रही है किन्तु कुछ दशक पहले तक प्राकृतिक संसाधन ही महत्वपूर्ण थे । वर्तमान में प्राकृतिक के साथ-साथ मानवीय संसाधन किसी भी राष्ट्र की भूमिका निश्चित करने में महत्वपूर्ण योगदान करते हैं । तीव्र वैश्विक विकास हेतु राष्ट्रों के बीच प्रतियोगिता छिड़ी हुई है । ऐसे में ज्ञान को सर्वाधिक प्रेरक बल के रूप में सर्वमान्य रूप से स्वीकार कर लिया गया है । वैश्विक स्तर पर यह माना जा रहा है कि आगामी वर्षा में विकास की रूपरेखा व राष्ट्रों की भूमिका निश्चित करने का कार्य ज्ञान तय करेगा | वैश्विक स्तर पर एक प्रतियोगी खिलाड़ी के रूप में उभरने की भारत की क्षमता अधिकांशत: ज्ञान संसाधनों पर ही निर्भर करेगी । पीढ़ी गत बदलाव को प्रोत्साहित करने के लिये एक ऐसा व्यवस्थागत बदलाव जरूरी है जो समूचे ज्ञान क्षेत्र की समस्याओं की ओर ध्यान दे सकें । ज्ञान के विस्फोट, सूचना क्रांति, ज्ञान की गुणवत्ता, ज्ञान की सुलभता व रचनात्मक ज्ञान को ज्ञान संसाधनों के रूप में विकसित कर सकें | भारत जैसे विशाल व विविधतापूर्ण राष्ट्र में ज्ञान के क्षेत्र में सुधार व ज्ञान को एक संसाधन के रूप में विकास करने के लिये एक सुदृढ़ प्रयास व कार्यकारी योजना की आवश्यकता है । ज्ञान की ऐसी क्रांति हो जो क्षमता निर्माण करने और गुणवत्ता पैदा करने में सक्षम हो । इसलिए राष्ट्रीय ज्ञान आयोग का गठन किया गया ।

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारत ने शिक्षा के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की है किन्तु जनसंख्या विस्फोट, संसाधनों व अवसरों की कमी व शिक्षा के प्रति जागरूकता की कमी के कारण भारत के प्रत्येक नागरिक को शिक्षित करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य बन गया, इसलिए भारत में शिक्षा के अधिकार की मांग लम्बे समय से उठ रही थी । राष्ट्रीय ज्ञान आयोग ने भी ज्ञान के बढ़ते महत्व को देखते हुए शिक्षा के अधिकार की पुरजोर सिफारिश की । स्वतंत्रता के साठवें दशक में भारत सरकार ने शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 को मौलिक अधिकार का दर्जा दे दिया । अब देश के प्रत्येक 6 से 14 वर्ष तक के बच्चे को अनिवार्य व निःशुल्क प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार प्राप्त है । निश्चित रूप से भारत जैसे लोकतांत्रिक देश व समाज के सशक्तिकरण एवं उत्थान के लिये शिक्षा का अधिकार मील का पत्थर साबित होगा।

इस इकाई में राष्ट्रीय ज्ञान आयोग के गठन की परिकल्पना, उद्देश्य, क्षेत्र, विचारार्थ विषय एनकेसी के प्रभाव, केन्द्र व राज्य सरकारों के साथ उन का सम्पर्क व पहल एवं शिक्षा के अधिकार सम्बन्धी विभिन्न आयामों को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है ।

18.2 राष्ट्रीय ज्ञान आयोग की परिकल्पना

राष्ट्रीय ज्ञान आयोग की परिकल्पना राष्ट्रीय विकास परिषद् द्वारा अपनाई गई 11 वीं पंचवर्षीय योजना में परिलक्षित होती है । यह योजना विस्तार उत्कृष्टता और साम्यता पर विशिष्ट बल देते हुए त्वरित व समावेशी उन्नति के लिये केन्द्रीय साधन के रूप में शिक्षा को उच्च प्राथमिकता देती है । दसवीं में शिक्षा का हिस्सा 7 से बढ़कर 20% तक पहुँच जायेगा जो कि जी.डी.पी. के 6% के लक्ष्य की दिशा में एक विश्वसनीय प्रगति का परिचायक होगा । सरकारी नियोजन के इतिहास में यह एक ऐतिहासिक पहल है । इस दृष्टि से प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की ज्ञान आयोग की परिकल्पना निश्चित रूप से प्रशंसनीय है | यह इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है कि हमारे ज्ञानाधार के विशाल भण्डार का लाभ उठाने के निमित्त एक कार्य योजना तैयार करने के प्रयोजन करवाना ज्ञान आयोग की परिकल्पना की गई जिससे कि भारत 21 वीं शताब्दी की चुनौतियों का सामना आत्म विश्वास करवाना कर सकें ।

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