शिक्षा को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक कौन-कौन से है?

शिक्षा को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक कौन-कौन से है?

सरकार की वर्तमान नीति के अनुसार प्रत्येक 500 जनसंख्या की आबादी के पीछे एक प्राथमिक विद्यालय होना चाहिए । किन्तु अभी देश में लगभग 350 लाख ग्रामीण ऐसे है। जिनकी आबादी 500 से कम है । अत: इनके बच्चों को अन्य स्थानों पर पढ़ने जाना पड़ता है। वन, नाले, नदी, दूरी आदि कारणों से अन्य गाँव में जाकर बालक के लिए पढ़ना सम्भव नही है। परिणामत: अभिभावक छोटे बालको को विशेषत: बालिकाओं को, इतनी दूर भेजना उचित नहीं समझते और ये बालक शिक्षा से वंचित रह जाते है ।

4.5 शैक्षिक कारक

शिक्षा जगत में प्रचलित पाठ्यक्रम प्राय: दोषपूर्ण हैं | इस पाठ्यक्रम में स्थानीय आवश्यकताओं पर कोई बल नही दिया गया है | राजस्थान में राजस्थान राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान (SCIERT) इस कार्य को करती है । पाठ्यक्रम में पुस्तकीय ज्ञान पर बल दिया गया है । साथ ही सम्पूर्ण राजस्थान में एक जैसा ही पाठ्यक्रम निर्धारित किया गया है । क्षेत्रीय, भिन्नता, स्थानीय परिस्थितियों आदि का कोई ध्यान नहीं रखा गया है।

वर्तमान पाठ्यक्रम न तो जीवन से सम्बन्धित है और न व्यावहारिक ही है । पाठ्यक्रम में न तो सरलता है न आकर्षण ही । रचनात्मक क्रियाओं को इनमें कोई स्थान नही दिया गया है । यदि यह कहा जाए कि पाठ्यक्रम केवल साक्षर बनाने का कार्य करता है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी ।

(1) अध्यापकों का अभाव

 प्राथमिक पाठशालाओं में शिक्षको की नितांत कमी रहती है । एक अध्यापकीय पाठशालाएँ तों और भी अधिक समस्याग्रस्त होती है । परन्तु राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के परिप्रेक्ष्य में “ब्लेक बोर्ड ऑपरेशन” के तहत प्रत्येक विद्यालय में कम से कम दो शिक्षक कार्यरत हैं । अतः शिक्षक समस्त छात्रों को मात्र घेर कर बैठता है और उन्हे भाग्य के भरोसे छोड़ देता है ।।

योग्य, अनुभवी तथा शिक्षा के क्षेत्र में रूचि रखने वाले व्यक्ति शिक्षा के क्षेत्र में कम ही आ पाते हैं । जो आ भी जाते है देर सवेर अन्य सेवाओं के क्षेत्र में चले जाते है कारण कि शिक्षकों की सेवा स्थिति, वेतनमान अन्य सेवाओं की अपेक्षा कम हैं । अब तो इस क्षेत्र में वही व्यक्ति आते है जिन्हे अन्य क्षेत्रों में स्थान नही मिल पाता । अतः योग्य शिक्षकों को आकर्षित करने के लिए उनकी सेवा शर्तों में सुधार, आकर्षक वेतनमान, पहाड़ी रेगिस्तानी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में पृथक से भत्ता देना चाहिए ताकि योग्य, अनुभवी एवं अच्छे व्यक्ति शिक्षा जगत की और आकर्षित हो सकें ।

(2) अधिगम (सहायक) सामग्री का अभाव

प्राथमिक विद्यालयों में सहायक अधिगम सामग्री नाम मात्र की उपलब्ध होती है और वह भी बाबा आदम के जमाने की । परिणामत: शिक्षक विद्यार्थी को मौखिक ज्ञान ही देता है । व्यावहारिकता के अभाव में छात्रों की रूचि, जिज्ञासा शान्त नही हो पाती और वे विद्यालय से जी चुराने लगते है । आधुनिक तकनीकी आधारित उपकरण यन्त्र व साधनों को प्रयुक्त करना शिक्षण को रूचिकर बनाने के लिए अनिवार्य है ।।

(3) दोषपूर्ण परीक्षा प्रणाली

वर्तमान परीक्षा प्रणाली भी दोषपूर्ण है । इसमें केवल सैद्धान्तिक पक्ष पर जोर दिया जाता है | व्यावहारिक पक्ष शून्य रहता है । मूल्यांकन की अविश्वसनीयता बनी रहती है | एक ही प्रश्न के मूल्यांकन में विविधता आ जाती है ।।

प्राथमिक विद्यालयों में निरीक्षण एवं मार्गदर्शन हेतु सरकार ने अधिकारियों की लम्बी फौज खड़ी कर रखी है । फिर भी अनेक विदयालय ऐसे दुर्लभ स्थान पर हैं जहाँ पर पाँच-पाँच वर्ष तक कोई अधिकारी नहीं जा पाता । मार्गदर्शन एवं निरीक्षण नाम मात्र का होता है ।।

उपर्युक्त शैक्षिक कारकों के अतिरिक्त अन्य अनेक कारण है जैसे बालक की रूचि, अभिरूचि का ध्यान नहीं रखना, शिक्षा का जीवन से सम्बन्धित न होना, व्यक्तिगत भिन्नता को नजर अन्दाज कर देना आदि ।

4.6 भौगोलिक कारक

भारत एक विशाल देश है जिसमें दुर्गम रेगिस्तान, अगम्य पर्वतमालाएँ तथा भीषण जंगल है । इस भौगोलिक विविधता के परिणामस्वरूप ही शिक्षा को अनिवार्य नही बनाया जा सका । पर्वतीय क्षेत्र में आवागमन के कारण बालक एक स्थान से दूसरे स्थान पर शिक्षा ग्रहण करने नहीं जा सकता है । विशाल मरूस्थल में गाँव और आबादी छितरी हुई है । प्रत्येक ढाणी में विद्यालय नही है । अत: मरूस्थलीय प्रदेश में विशेषत: ग्रीष्मकाल में जब अंधड चलते हैं, बालकों का शिक्षा ग्रहण करने एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना सम्भव नही है । असम नागालैण्ड आदि ऐसे प्रदेश है जहाँ जंगलो, नालों आदि की बहुतायत है और जंगली पशु विचरण करते है । ऐसी परिस्थितियों में बचे का विद्यालय जाना टेढ़ी खीर है ।।

4.7 सारांश

शिक्षा की स्थिति को विकसित करने में अनेक कारकों का योगदान है, जैसी राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक तथा भौगोलिक आदि । समाज में रहकर व्यक्ति एक-दूसरे के सम्पर्क में आता है । उसके साथ विचारों का आदान-प्रदान करता है । यह तभी सम्भव है जब शिक्षा के उद्देश्य सामाजिक परिस्थितियों के अनुकूल हो ।

अधिकांश बालकों के अभिभावक स्वयं अशिक्षित है । फलत: वे शिक्षा के महत्व से अपरिचित हैं । वे अपने बालकों को शिक्षा दिलाने में रूचि नहीं रखते और साथ में भाग्यवादिता का सहारा लेते हैं । अशिक्षित अभिभावक बालको की शिक्षा के लिए अभिशाप सिद्ध होते है और वे सम्पन्न होते हुए भी बालकों की शिक्षा की और ध्यान नहीं देते ।।

शिक्षा के उद्देश्य निर्माण में आर्थिक परिस्थितियाँ विशेष योग देती हैं । भारत एक विकासोन्मुख राष्ट्र हैं । आर्थिक उन्नति एवं प्रत्येक नागरिक को रोजगार उपलब्ध कराने हेतु हमारी सरकार प्रयत्नशील है और इसकी पूर्ति हेतु व्यावसायिक विद्यालयों का समस्त देश में जाल बिछा दिया गया हैं ।

अत: आर्थिक परिस्थितियाँ शिक्षा के उद्देश्य निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। कोई भी देश, तब तक आत्मनिर्भर नहीं हो सकता तब तक कि उसके प्रत्येक नागरिक को जीविकोपार्जन के साधन उपलब्ध नही हों । अतः शिक्षा के उद्देश्य निर्धारण में आर्थिक कारक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते है ।

शिक्षा का वर्तमान पाठ्यक्रम भी न तो जीवन से सम्बन्धित है और न व्यावहारिक ही। रचनात्मक क्रियाओं को इनमें कोई स्थान नहीं दिया गया है । यदि यह कहा जाए कि पाठ्यक्रम केवल साक्षर बनाने का कार्य करता है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी । अत: अध्यापकों का अभाव, सहायक सामग्री का अभाव, आदि ऐसे कारक हैं जो शिक्षा की प्रगति को बाधित दोषपूर्ण परीक्षा प्रणाली करते रहते है ।

4.8 मूल्यांकन प्रश्न

1. शैक्षिक कारक क विवेचना कीजिए ।

2. आर्थिक एवं सामाजिक कारक शिक्षा को किस प्रकार प्रभावित करते है? विस्तार से बताइए ।

4.9 संदर्भ ग्रंथ

1. अग्रवाल एस. के.  : शिक्षा के तात्विक सिद्धान्त

2. बंसल आर. ए. तथा शर्मा : शिक्षा के सिद्धान्त

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