नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986 की कौन कौन सी सिफारिशें सराहनीय है और क्यों?

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986 की कौन कौन सी सिफारिशें सराहनीय है और क्यों?

विभिन्न स्तरों पर शैक्षिक पुनर्गठन

इसके अन्तर्गत ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड का विस्तार करने, भावी नियुक्तियों में 50 प्रतिशत महिलाएँ रखने, अनौपचारिक शिक्षा कार्यक्रम के माध्यम से कामकाजी बच्चों तथा लड़कियों को शिक्षा देने, 14 वर्ष तक के बालकों के लिऐ निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध कराने, विज्ञान, वाणिज्य एवं कम्प्यूटर शिक्षा पर जोर मुक्त शिक्षा प्रणाली तथा मूल्यांकन सुधार जैसी बातों को प्रोत्साहित करने की बात कही गई ।

तकनीकी एवं प्रबन्धन

अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद् को सुदृढ़ करने की बात कही गई ।

शिक्षा के पाठ्यक्रम एवं प्रक्रिया का अभिनवीकरण

जनसंख्या नियंत्रण को जनसंख्या नियंत्रण की राष्ट्रीय नीति के महत्वपूर्ण अंग के रूप में देखा जायेगा तथा परीक्षा सुधारों के लिए राष्ट्रीय परीक्षा सुधार प्रारूप तैयार किया जायेगा ।

शिक्षा का प्रबन्धन

राष्ट्रीय एवं राज्य स्तर पर प्रशासनिक प्राधिकरण की तर्ज पर शैक्षिक प्राधिकरण की स्थापना की जायेगी, साथ ही आठवीं पंचवर्षीय योजना तथा उसके बाद शिक्षा पर व्यय राष्ट्रीय आय के 6 प्रतिशत से अधिक होने को सुनिश्चित किया जायेगा । । संशोधित कार्यान्वयन कार्यक्रम (1992 ) को 23 खण्डों में विभाजित कर इसे क्रियान्वित करने की बात कही कई । विभिन्न वर्गों (नारी शिक्षा, विकलांग शिक्षा, अनुसूचित जाति-जनजाति की शिक्षा, प्रौढ़ एवं सतत् शिक्षा, अल्पसंख्यकों के लिए शिक्षा) की शिक्षा विभिन्न स्तरों (पूर्व प्राथमिक, प्राथमिक, माध्यमिक एवं उच्च स्तरीय) पर शिक्षा, व्यावसायिक शिक्षा, नवोदय विद्यालय, मूल्यांकन सुधार, अध्यापक प्रशिक्षण, शिक्षा का प्रबन्धन, अनुसंधान एवं विकास मुक्त शिक्षा जैसे विभिन्न क्षेत्रों को पृथक-पृथक खण्डों में रखकर विभिन्न कार्यान्वयन कार्यक्रम तैयार किये गये ।।

परिमार्जित POA में समानता एवं सामाजिक न्याय को दृष्टिगत करते हुए महिलाओं की शिक्षा को महत्वपूर्ण स्थान दिया । इसके अतिरिक्त तकनीकी एवं व्यावसायिक शिक्षा में बालिकाओं के लिये प्रवेश के अवसर, सम्पूर्ण साक्षरता एवं सतत् शिक्षा कार्यक्रमों में महिलाओं की भागेदारी, संचार माध्यम द्वारा महिलाओं में पढ़ने-लिखने के वातावरण का सृजन इत्यादि अनेक बिन्दु हैं जिनके द्वारा महिलाएँ भी विकास की धार में सम्मिलित होकर राष्ट्र की उन्नति में सहयोग प्रदान कर सकेंगी ।

अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पिछड़े वर्ग की शिक्षा, अल्पसंख्यकों एवं विकलांगों की शिक्षा को कार्यान्वित करने के लिए अनेक सुझाव दिए गए ।।

17.6 राष्ट्रीय शिक्षा नीति का क्रियान्वयन व वर्तमान भारतीय शिक्षा की स्थिति

केन्द्र सरकार ने अपनी अगुवाई में शैक्षिक नीतियों एवं कार्यक्रम बनाने और उनके क्रियान्वयन पर नजर रखने के कार्य को जारी रखो है । इन नीतियों में सन् 1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति (छक् 1986 ) तथा कार्यवाही कार्यक्रम (छच1986) शामिल है । जिसके अन्तर्गत शिक्षा में एकरूपता लाने, प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम को जन आदोलन बनाने, शिक्षा को सर्वसुलभ बनाने, बुनियादी शिक्षा की गुणवत्ता बनाये रखने, बालिका शिक्षा पर जोर देने व व्यवसायपरक शिक्षा पर जोर दिया गया । इसके साथ ही सी ए बी ई की तीन स्थायी समितियां बनाये जाने का निर्णय किया गया है

1. नई शिक्षा नीति को लागू कराने की विशेष आवश्यकता सहित बच्चों एवं युवाओं के लिए शिक्षा हेतु स्थायी समिति ।
2. प्रौढ़ शिक्षा व राष्ट्रीय साक्षरता मिशन को निर्देश देने के लिए स्थायी समिति ।।
3. बच्चों को शिक्षा, बाल विकास, पोषण एवं स्वास्थ्य संबंधी विभिन्न योजनाओं को ध्यान में रखते हुए बाल विकास प्रयासों के समन्वय और एकीकरण मामलों के लिए एक स्थायी समिति ।

शिक्षा सेवाओं के तहत भारतीय संशोधित प्रस्तावों में उच्च शिक्षा क्षेत्र के लिए कई शर्ते रखी गई है | इनके अनुसार उच्च शिक्षा संस्थानों को सक्षम अधिकार के माध्यम से शुल्क निर्धारित करने की अनुमति है ।

1986 में जब राष्ट्रीय शिक्षा नीति की घोषणा हुई तो उसमें यह कहा गया था कि हमारा लक्ष्य है – सभी के लिये शिक्षा । हमारी शिक्षा वर्तमान एवं भविष्य के निर्माण के लिये एक अद्वितीय पूंजी निवेश है । इसके बाद में 1992 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर पुनर्विचार किया गया और यह कहा गया कि इसमें सुधार होना चाहिए और उसके अनुसार कुछ नये सुझाव देकर संशोधित राष्ट्रीय नीति, 1992 को आचार्य राममूर्ति कमेटी के प्रतिवेदन के अनुसार बनाया गया । उसमें यह कहा गया कि शिक्षा का लक्ष्य अहिंसात्मक तथा शोषणमुक्त सामाजिक तथा आर्थिक रूप से व्यवस्था करना है | भारत की शिक्षा नीति की कुछ मूलभूत कमियों को दर्शाया गया है
1. देश में आर्थिक असमानताओं का प्रभाव शिक्षा पर भी दृष्टिगोचर हो रहा है | आज शिक्षा एक व्यवसाय बनकर रह गया है और निजीकरण ने शैक्षिक अवसरों की समानता के अधिकार को साधारण बालक से छीन लिया है ।।
2. राष्ट्रीय शिक्षा नीति में शिक्षा, शैक्षिक नियोजन एवं प्रबन्ध प्रणाली में परिवर्तन कर उच्च प्राथमिकता देने का प्रस्ताव रखा गया है लेकिन प्रबन्ध प्रणाली में भ्रष्टाचार व अकर्मण्यता बढ़ गयी है । शिक्षा संस्थाओं के चलाने वालों की शोषण प्रवृत्ति और भ्रष्टाचार नीतियों पर कोई नियंत्रण नहीं है ।
3. शिक्षा नीति में शाश्वत मूल्यों के विकास को केवल सैद्धान्तिक रूप में ही स्वीकारा गया है, कोई प्रभावी कार्य नहीं किया गया ।
4. राष्ट्रीय शिक्षा नीति का यह दावा रहा है कि सभी के लिए शिक्षा उपलब्ध हो । (Education for all) लेकिन अभी भी लाखों बालक-बालिकाएँ स्कूल से वंचित है ।
5. 2006-07 में भारत सरकार सेम पिट्रोडा की अध्यक्षता में बने राष्ट्रीय ज्ञान आयोग (छंजपवदंस ज्ञदवूरसमकहम बउउपेपवद) ने यह सिफारिश की है कि भारत में 7500 से अधिक विश्वविद्यालय होने चाहिए | इतने वर्षों के पश्चात शिक्षा नीति की यह आलोचना है कि विश्वविद्यालयी शिक्षा का स्तर निरन्तर गिरता जा रहा है ।
6. राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुसार टी. वी., सिनेमा, रेडियो, जनसंचार के साधन शिक्षा और मानवीय मूल्यों का विकास करने में बहुत अधिक उपयोगी हो सकेंगे, लेकिन आज अश्लीलता व अनैतिकता के पर्याय के रूप में ये सभी जनसंचार साधन स्थापित हो चुके हैं ।
7. स्कूलों में मिड-डे-मील के नाम पर खराब भोजन दिया जा रहा है ।
8. शिक्षा वर्ग भेद, सामाजिक असंतोष, भ्रष्टाचार, क्षेत्रीयवाद और साम्प्रदायिकता को रोकने में सक्षम नहीं हो पा रही है ।

17.7 मूल्यांकन प्रश्न

1.. राष्ट्रीय शिक्षा नीति को आधार मानकर भारत में शिक्षा का प्रसार किस प्रकार हो पाया
3. संशोधित राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1992 प्रतिवेदन क्या है? समझाये ।।
4. पाठ्यक्रम तथा प्रक्रिया का अभिनवीकरण के लिए राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने क्या कार्य किये हैं?
5. 1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुसार तकनीकी व प्रबन्ध शिक्षा का क्या प्रावधान किये?
6. राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने खुला विश्वविद्यालय व दूरस्थ अधिगम के लिए क्या कार्य किये?

17.8 सन्दर्भ ग्रन्थ
1. प्रो0 रूहेला, सत्यपाल : नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2008, तरूण प्रकाशन
2. डॉ0 बायती जमना लाल | : शिक्षा प्रशासन एवं प्रबन्ध के आधुनिक सिद्धान्त. 2005 तरूण प्रकाशन
3. डॉ0 बाघेला, एच.एस. शैक्षिक प्रबन्ध व विद्यालय संगठन, 2006 तरूण प्रकाशन

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